दिव्य विचार: बिगड़ना-सुधरना सब संस्कारों की बात है- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि एक व्यक्ति को वही वातावरण और संस्कार मिलते हैं, इसके बावजूद कोई बिगड़ जाता है, कोई सुधर जाता है। एक माँ के पाँच बेटों की किस्मत अलग-अलग होती है। कोई शराबी बन रहा है तो अपने ही कारण, कोई सभ्य, सुशील तथा शालीन बन रहा है तो भी अपनी ही वजह से। वह जैसा सोचेगा, वैसे ही बीजों का वपन होगा। जैसे बीज होंगे वैसे ही फसलों को काटने के लिए उसे मजबूर होना पड़ता है। अगर आप चाहते हैं कि जीवन में फसलों को काटते वक्त खेद और प्रायश्चित न हो तो बीजों को बोते वक्त विवेक रखें। ईसा ने बाइबिल में कहा है, व्यक्ति जैसा है, वह अतीत में सोचे गये। विचारों का परिणाम है। व्यक्ति के विचार ही शब्द बनते हैं, शब्द ही एक्शन बनते हैं, उसके एक्शन ही आदत बनती है, आदतें ही चरित्र बनती हैं और चरित्र ही व्यवहार और कर्म होता है। विचारों के परिणाम ही जीवन में आते हैं। अगर आप शुभ विचारों से गुजर रहे हैं तो आप स्वर्ग के रास्ते की ओर बढ़ते हैं और यदि अशुभ विचारों से गुजर रहे हैं तो नरक की दहलीज पर खड़े हैं। मरने के बाद क्या स्वर्ग और नरक ? स्वर्ग और नरक तो छाया की तरह साथ ही चलते हैं जैसे दायाँ-बायाँ साथ चलता है। अपने मन को देखें और पहचानें कि कहीं अशुभ, वैर-वैमनस्य, राग-द्वेषजनित विचार साथ तो नहीं चल रहे हैं ? वस्तुतः ये ही नरक का द्वार लिये चलते हैं। इसके विपरीत प्रेम और शांति, मैत्री और करुणा की भावदशाएँ सदा स्वर्ग की यात्रा कराती हैं। मेरे देखे, व्यक्ति दिन भर में पचासों बार स्वर्ग-नरक की यात्रा कर लेता है। तुमने क्रोध किया तो नरक में चले गये, कल तुमने दुश्मन को क्षमा कर दिया तो तुम स्वर्ग की सैर कर आये। इसी तरह व्यक्ति अपनी मानसिकता में स्वर्ग-नरक के बीच पैण्डुलम की तरह डोलता है। आज मैं व्यक्ति को उसके मन और विचारों से रूबरू कराना चाहूँगा कि वह किस तरह उनसे घिरा हुआ है। व्यक्ति संसार में किसी मोह-माया से नहीं घिरा है। वह घिरा है तो अपने ओछे और अच्छे विचारों से ही घिरा और उनसे निकलना चाहकर भी नहीं निकल पाता।






