दिव्य विचार: आत्मा पर दृष्टि केन्द्रित करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: आत्मा पर दृष्टि केन्द्रित करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बस यही प्रतीति ही बहुत जरूरी है। स्व और पर के भेद को जानो । अध्यात्म के आचार्य कहते हैं - यदि तुम सच्चे अर्थों में अपनी आत्मा का आनन्द पाना चाहते हो तो शरीर को पड़ोसी मानो। पड़ोसी का मतलब क्या है ? पड़ोसी का तात्पर्य है अगल-बगल में रहने वाला। संस्कृत में तो इसकी बहुत सुन्दर व्याख्या की गई है। वहाँ कहा गया है पर असि परोऽसि । संस्कृत में र और ल तथा र और ड में अभेद माना जाता है। अर्थात् जो पराया है, वह पड़ोसी है। जो अपना नहीं है, वह पड़ोसी है। पर क्या करें जो पराया है, उसे हम गले लगाते हैं। और जो अपना है उसकी उपेक्षा करते हैं। जो अपना है उसे पहचानो। जो तुम्हारा है उसे जानो। तब जीवन में कुछ सार्थक उपलब्धि घटित हो सकती है। अन्यत्वभावना हमें यही बताती है शरीर में रहो, शरीरधारी रहो, लेकिन शरीर में उलझो मत । शरीर की उत्पत्ति एवं विनाश में खिन्न मत हो। उससे प्रसन्न भी न हो। आत्मा में यदि तुम्हारी दृष्टि केन्द्रित होगी तो तुम्हारी दुनिया ही बदल जायेगी। शरीर से भिन्नता की प्रतीति का नाम ही अन्यत्वभावना है। शरीर नहीं तो फिर बाकी की चीज ही नहीं। संत कहते हैं -जब तुम्हारा शरीर से ही एकत्व नहीं है, जब तुम शरीर से ही भिन्न हो तो फिर पुत्र, कलत्र, मित्र आदि परिजनों से एकत्व को कैसे प्राप्त हो सकते हो। जैसे शरीर में रोमकूप होते हैं, किन्तु चर्म को शरीर से अलग कर देने पर वे उससे स्वयमेव समाप्त हो जाते हैं। ऐसे ही संसार के संयोग हैं, जब तक है सो तब तक ही हैं। अलग होते देर नहीं लगती। कौन तुम्हारा है ? कौन तुम्हारे परिजन हैं ? लोग कहते हैं - मेरे पिता, मेरी माता, मेरी बहिन, मेरा भाई, मेरी पत्नी, मेरा पति आदि-आदि बहुत अच्छी बात है। कब से हैं ? आज ये मेरे परिजन हैं। याद करो जिसे बिलखते छोड़कर आए थे वे भी तुम्हारे परिजन थे। अपने पुराने परिजनों को बिलखते छोड़कर आए हो और यहाँ भी उन्हीं परिजनों को बिलखते छोड़ करके जाओगे। रोज तुम अपने परिजन बदलते हो। कौन हैं तुम्हारे अपने परिजन ?