दिव्य विचार: आप तय करें जीवन को स्वर्ग बनाएं या नर्क- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

दिव्य विचार: आप तय करें जीवन को स्वर्ग बनाएं या नर्क- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य का जीवन प्रकृति की ओर से मिला हुआ महान् वरदान है। यदि हम प्रसन्न और विश्वास भरे हृदय के साथ जीवन को निहारें तो जीवन हमें स्वर्ग का पवित्र हिस्सा नजर आता है। वहीं यदि खिन्न और विपन्न हृदय से जीवन को निहारा जाय तो जीवन नरक का नमूना नजर आता है। जीवन को स्वर्ग या नरक बनाना मनुष्य का खुद का फैसला है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने स्वर्ग जैसे जीवन को भी नरक बना लेते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो नरक जैसे जीवन को स्वर्ग बना लिया करते हैं। तीन और तीन छः भी हो सकते हैं, नौ भी हो सकते हैं, शून्य भी हो सकते हैं और तैंतीस भी हो सकते हैं। यह मनुष्य की व्यवस्था पर निर्भर है कि वह अपने जीवन के अंकों को दुगुना, तिगुना या शून्य का परिणाम देता है अथवा तैंतीस गुना करता है। अगर कुदरत ने किसी को शक्ति प्रदान की है तो वह उसका उपयोग निर्माण या विध्वंस में करे यह उसी पर निर्भर है। प्रकृति-प्रदत्त वाणी का उपयोग मनुष्य सुमधुर वचनों के लिए करता है या विषैले व्यंग्य बाणों के लिए, यह उपयोगकर्ता पर निर्भर है। 'ग' से 'गधा' और 'गणेश' दोनों बनते हैं, 'स' से 'सत्य' और 'सत्यानाश' दोनों होते हैं। हम अपनी जिह्वा से किस शब्द का किस भाव से, किस अर्थ में और किस प्रयोजन के लिए उपयोग करते हैं, यह उपयोग करने वाले पर अवलंबित है। मनुष्य का जीवन तो तानपूरे के तारों की तरह होता है जिसे वह साध ले तो मीराबाई के गीत, चैतन्य महाप्रभु का नृत्य या तुलसीदास के महाकाव्य को अपनी स्वरलहरियाँ दे सकता है। हाँ, अगर उसने तारों को साधने की बजाय अधिक कस दिया तो तानपूरा संगीत का आधार न बनेगा, अपितु वह किसी कौवे की कांव-कांव बन जायेगा। अगर तानपूरे के तारों को जरूरत से अधिक ढीला छोड़ दिया जाय तो तानपूरा संगीत की फुलवारियाँ बरसा न पायेगा। वह बेसुरा हो जायेगा। जिसे जीवन के तानपूरे को साधना आ गया, तारों को किस मात्रा में कसा या ढीला छोड़ा जाय, व्यक्ति को अगर यह कला आ गई तो ऐसा लगेगा मानो आम्र वृक्ष पर कलियाँ खिल गई हैं और कोयल कुहुक रही है।