दिव्य विचार: कमजोर को संरक्षण देना हमारा दायित्व- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि संत कहते हैं कि इसी प्रकार समाज भी एक विशाल शरीर की तरह है और समाज का एक-एक घटक उसका कोई न कोई अंग है। अगर कोई भी अंग कमजोर है तो उसको संरक्षण देना हमारा दायित्व है। वह संरक्षण आप तभी देंगे जब आपके अन्दर साधर्मी वात्सल्य होगा। एक ज़माना था जब लोगों का हृदय प्रेम से भरा होता था। समाज के छोटे-बड़े सभी लोगों का सम्मान करना लोग जानते थे। उस समय बिरादरी में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता था। एक ही प्रतिमान हुआ करता था। इसकी धार्मिकता कैसी है ? पहले धार्मिकता का आदर होता था। सबको सम्मान मिलता था और आज सिर्फ बड़ों-बड़ों को सम्मान मिलता है। छोटों को जैसा सम्मान देना चाहिये वह नहीं है, क्योंकि हमारी दृष्टि क्षुद्र हो गई है। हम लोगों के बाहरी टिपटॉप को तो देखते हैं, भीतर के तत्त्व को नहीं देखते हैं। बन्धुओं, एक बात ध्यान रखना कि जो आज टिपटॉप दिख रहा है वह कल फुटपाथ पर भी हो सकता है और जो आज फुटपाथ पर है वह कल टिपटॉप हो सकता है। भीतर का जो स्वरूप है वह अपरिवर्तनीय है उसको देख करके चलोगे तो जीवन में कभी विसंगति नहीं आयेगी और उसकी उपेक्षा करोगे तो कभी जीवन में संगति नहीं मिल सकती है इसलिये जीवन की संगति को बिठलाना चाहते हो तो भीतर के तत्त्व पर विश्वास करके चलो। यदि कोई व्यक्ति किसी कारण से परेशान है और आप यदि सक्षम हैं तो उसका सहयोग करो। क्योंकि उसके अन्दर वही धर्म तत्त्व है। यदि हम उसे संरक्षण देंगे तो धर्म को संरक्षण मिलेगा। उसको यदि हम सहयोग देंगे तो धर्म को सहयोग मिलेगा। और अगर उसकी उपेक्षा की तो धर्म की उपेक्षा होगी। सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा व्यक्ति सबको गौण कर सकता है, पर धर्म को नहीं कर सकता है। ध्यान रखना, दूसरों के प्रति वात्सल्य वृत्ति अपनाकर हम उस पर उपकार नहीं करते हैं, हम स्वयं पर उपकार करते हैं। अपने सम्यग्दर्शन को पुष्ट करते हैं। अपनी धार्मिक भावना को दृढ़ बनाने का सौभाग्य अर्जित करते हैं। यदि हमारा सम्यक्त्व पुष्ट होता है तो हम भवसागर से पार उतरने में सक्षम हो सकते हैं।






