दिव्य विचार: जैसा वातावरण होगा वैसी सोच बनेगी- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि हमारी सोच और मानसिकता को प्रभावित करने वाला दूसरा तत्व 'वातावरण।' जिस माहौल या वातावरण में हम रहते हैं, वही हमारी सोच का कारक होता है। बच्चे को जैसा वातावरण मिलेगा, उसका वैसा ही विकास होगा। हर बीज को व्यक्त होने के लिए वांछित परिवेश चाहिए। बच्चा तो गीले प्लास्टर की तरह है। हम उस पर जैसे निशान छोड़ेंगे, उसके भोले मन पर वे वैसे ही अंकित हो जाएगे। अच्छा पिता वह नहीं है जो संतान को जन्म दे, महान् वह भी नहीं है जो अपनी संतति को सम्पत्ति दे। महान् पिता वह है जो अपनी संतान को अच्छे संस्कार दे, उसे बेहतर जीवन जीने का अच्छा वातावरण दे। बच्चों पर निवेश करने के लिए यदि सबसे श्रेष्ठ कोई चीज है तो वह आपका बेशकीमती समय है, संस्कार है। आपके वे विचार हैं जो आप अपने आने वाले भविष्य में अपनी ओर से अपनी संतति की ओर से पुष्पित और पल्लवित करना चाहते हैं। कहा जाता है न कि डाकू के खेमे में अगर तोता रहेगा तो; वह अपने खेमे की तरह आते हुए किसी राहगीर को देखकर कहेगा 'लूटो-लूटो, कोई माल आया है।' यदि संत की कुटीर में रहने वाला तोता जब किसी राहगीर को वहाँ से गुजरते हुए देखेगा तो कहेगा, 'राम-राम, स्वागतम-स्वागतम, कोई अतिथि आया'। जिस वातावरण में तोता रहेगा, वही सीखेगा। फिर मनुष्य तो विकसित मस्तिष्क का स्वामी है। उसे जैसा माहौल, वातावरण मिलेगा, वह वैसा ही होता जाएगा। 'जीवन में अर्जित होने वाला अनुभव' वह तीसरा तत्त्व है जो मनुष्य की सोच को प्रभावित करता है। जीवन में लगने वाली ठोकरें ही आदमी को जगाती हैं। शायद मृत्यु भी आदमी को नहीं जगा पाती, लेकिन अनुभवों से आदमी सीखता है। इन्हीं से वह जीवन में कुछ बदलता है। लेकिन बार-बार ठोकर खाने पर भी जो नहीं सीखता या नहीं बदलता, वह मूर्ख की श्रेणी में आता है। मूर्ख ही बार-बार गलती को दोहराता है। एक बार गिरकर न सँभले, बार-बार गिरता रहे, यही मनुष्य की नासमझी है।






