दिव्य विचार: सद्भाव के बीज बोओ, आनंद मिलेगा- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि सद्भावों के बीज जितना बोओगे, आपको जीवन में उतने ही आनन्द की अनुभूति होगी और असद्भावों के बीजों की फसल आपके चित्त को दुर्भावों से उतनी ही अधिक दूभर कर देगी। हमें खुद सोचना होगा, अपनी प्राथमिकताओं को बदलना होगा, उदारता को अपनायें, एक-दूसरे की प्रशंसा करना शुरू कर दीजिये । आप देखिये, दूर की बात क्या करें ? हम आज घर-परिवार से ही अपनी बात शुरू करना चाहते हैं। आज भाई-भाई में बहुत ज्यादा ईष्या या विद्वेष होता है। दो भाई हैं, लेकिन दोनों भाइयों में एक-दूसरे के प्रति खाई है। एक भाई अगर आगे बढ़ रहा हो तो दूसरे भाई के मन में जो प्रसन्नता होनी चाहिये, वह प्रसन्नता तो एक तरफ रही, उसके दिमाग में आता है कि इसको नीचा कैसे दिखाया जाये ? बहुत आगे बढ़ता फिरता है। समाज में बहुत आगे अपना स्थान बना रहा है। खूब नाम कमा रहा है। दो नम्बर का काम करके आगे बढ़ रहा है। दुनिया का रिवाज़ है कि दूसरा आगे बढ़े तो वह दो नम्बर से बढ़ा और हम बढ़े हैं तो अपनी मेहनत और गाढी कमाई से बढ़े हैं। यह हमारी उल्टी सोच का नतीजा है। हम कभी किसी के प्रति अच्छा नहीं सोच पाते। आखिर ऐसा देख करके आपके अन्दर भी ऐसी ही असहिष्णुता का भाव विकसित होता है। ऐसी असहिष्णुता हमें ईष्यालु बना देती है और हम इसके कारण अपने सगे से दूर या जुदे हो जाते हैं। उनके प्रति प्रेम नहीं पनप पाता है। यदि भाई-भाई एक-दूसरे के गुणों की प्रशंसा करने लगते हैं, एक भाई में यदि किसी भी प्रकार की अच्छाई है और दूसरा भाई उसकी खुलेमन से प्रशंसा करता है दिल से स्वागत करता है और कहता है-भैया तुम्हारी इस उपलब्धि से हमें हार्दिक प्रसन्नता है तो देखो कितना आनंद आता है और दोनो भाईयों के बीच में कितना प्रगाढ़ संबंध बनता है। आजकल बड़ा विचित्र हाल है मैं ऐसा महसूस करता हूं कि समाज में लोगों को लोकप्रियता जल्दी मिल जाती है। वे लोग जो समाज में भले ही लोकप्रिय हैं, अपने परिवार के प्रिय नहीं बन पाते।






