दिव्य विचार: कर्म प्रभाव तो भोगना ही पड़ता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि ध्यान रखना, भगवान के चरणों में जाने के बाद तुम्हारा संकट दूर हो या न हो, संकट सहने की सामर्थ्य ज़रूर प्राप्त हो जायेगी। तुम्हारे अन्दर की समता विकसित हो जायेगी। और संकट के सहने की सामर्थ्य प्राप्त करना सबसे बड़ी उपलब्धि है। कोई विचलन नहीं, कोई परेशानी नहीं, कोई पीड़ा नहीं। वीतराग से बढ़कर आखिर इस संसार में है कौन और उसके बाद भी अन्य अन्य की पूजा हम वीतराग की तरह करते हैं तो यह हमारे अन्दर का मिथ्यात्व ही कहलायेगा। यह मिथ्यात्व अनन्तकाल से हम करते आये हैं, आगे भी करना पड़ेगा। बन्धुओ, मैं किसी पंथ और परम्परा से बँधा हुआ नहीं हूँ। हमारे आचार्यों ने हमसे कहा- मूढ़ ! जिनशासन क्या है ? इसे समझो। वीतरागी के पास आकर भी वीतरागता से दूर जाने वाला अभागा कितना बड़ा अभागा होगा ? यह सोचने की ज़रूरत है। दुनिया के जितने बड़े-बड़े उद्योगपति हैं उनसे पूछो कि वह किसको पूजते हैं? धन-सम्पन्नता किसी देवी-देवता की पूजन से नहीं होती, बल्कि व्यापार में तुम्हारी कुशल नीतियों की वजह से होती है और इसके साथ चाहिये पुण्य का संयोग। एक भिखारी आदमी देवी के चरणों में खूब माथा रगड़े और कहे कि मुझे करोड़पति बना दे और बुद्धि है नहीं तो क्या वह करोड़पति बन जायेगा ? पुण्य के संयोग के साथ जब तुम्हारी व्यापारिक नीति-निपुणता होगी और उसी अनुरूप तुम पुरुषार्थ करोगे तो तुम्हें फल मिलेगा, बाकी कहीं फल नहीं मिल सकता है। कदाचित दरिद्री बन जाओ, लेकिन दीन-हीन मत बनो। दूसरे के चरणों में स्वयं का माथा पटकना स्वयं को दीन-हीन बनाना है। सम्यग्दृष्टि कभी ऐसा नहीं करता है। ऐसी शक्ति हमें देना भगवन, मन का विश्वास कमजोर हो ना वह भगवान के चरणों में जाता है और कहता है कि- भगवान आपने मुझे यह सिखाया है और आपके चरणों में आकर मैं ये समझा हूँ कि मनुष्य के कर्म के अनुसार जैसा अनुकूल-प्रतिकूल होना होता है, वह उसे भोगना ही पड़ता है। आज मैं सम्पन्न हूँ, तो अपने कर्म से हूँ, विपन्न हूँ तो अपने कर्म के हूँ। यह पुण्य और पाप का खेल है।






