दिव्य विचार: तोड़ना सरल है पर जोड़ना कठिन- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: तोड़ना सरल है पर जोड़ना कठिन- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बनाने की सोचिये, मिटाने की नहीं। बसाने की सोचिये. उजाड़ने की नहीं और यदि समाज का नया नक्शा बनाना है तो जोड़ने की सोचिये, तोड़ने की नहीं। हम एक-दूसरे से जुड़कर चलने की कोशिश करें। कैंची और सुई दोनों का अलग-अलग काम होता है। कैंची क्या काम करती है ? उसका काम है काटना। और सुई का काम होता है सिलना। इसलिये वह सीधे-सीधे नहीं चलती है। क्योंकि सीने का काम बहुत घुमावदार होता है, इसलिये सुई बनकर काम करें, कैंची बनकर नहीं। आप एक-दूसरे के प्रेरक बनकर चलने का मन में संकल्प ले लेते हैं तो सारा काम हो सकता है। बन्धुओं, तोड़ना बहुत सरल है और जोड़ना बहुत कठिन है। एक-एक ईंट जोड़कर मकान बनाने में वर्षों लग जाते हैं और तोड़ने के लिए बुलडोजर का एक धक्का ही पर्याप्त है। ध्यान रखना ऐसी समरसता समाज में वर्षों में बनती है और वैमनस्य किसी एक व्यक्ति के स्वार्थ के आड़े आते ही।उसके अहं का जो टकराव आता है, वही सारा काम चन्द मिनटों में तमाम कर देता है, इसलिये कभी भी हम तोड़ने की बात न करें। जहाँ तक हो सके हम जोड़ने की कोशिश करें। हम इस बात को हमेशा अपने दिल-दिमाग में बैठाकर चलें कि मेरी किसी प्रवृत्ति से समाज का कोई अहित न हो। यदि आज हम कोई विष बीज बोकर चले गये तो उसका फल हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा और जब तक हम ऐसे कुकृत्य करते रहेंगे तब तक समाज में, परिवार में कटुता की विषबेल फलती-फूलती रहेगी। यदि समाज में स्वस्थ परम्परा को जन्म देना चाहते हो तो विषबीजों के वपन से बचो । स्वार्थ रूपी जो विषबीज हैं, उनसे अपने आपको मुक्त करने की कोशिश कीजिये । आपसी वैमनस्य यदि किसी कारण वश कहीं से उत्पन्न होता भी है तो उसे दूर करने का जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी प्रयास करें। जो आपस में लड़ते हैं, वे आफत में पड़ते हैं। यह हमें ध्यान रखना चाहिये। आग लगाने वाले के घर में बाग नहीं खिला सकते हैं।