दिव्य विचार: हमें अपने नहीं दूसरों के दोष दिखते हैं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: हमें अपने नहीं दूसरों के दोष दिखते हैं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हम सब साधना के मार्ग पर चलने वाले हैं। तय है कि हर कोई चलता है पर यह जरूरी नहीं कि जो चले वह केवल चलता ही रहे। चलते चलते, कई-कई बार गिरने की भी नौबत आ जाती है। लोग गिरते हैं, सम्हलते हैं तब चलते हैं। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो कि केवल चलता रहे। मोक्षमार्ग में यदि हम चल रहे हैं तो हमारे द्वारा अनेक प्रकार के दोषों के होने की सम्भावनायें भी हैं। क्योंकि साधक वह है जो अपने दोषों के उन्मूलन के लिये लगा हुआ है। दोषों के उन्मूलन का प्रयत्न जब तक चलता है तब तक हमारे भीतर दोषों के छुपे होने की सम्भावनायें भी बनी रहती हैं। कभी-कभी हमारे भीतर की दुर्बलता या हमारे भीतर का जो दोष है वह हमसे बड़ी से बड़ी त्रुटियाँ करा लेता है। उस त्रुटि के कारण कभी-कभी पूरा का पूरा मार्ग बदनाम होने की कगार पर आ जाता है। मार्ग से लोग स्खलित होने की स्थिति में भी आ जाते हैं। सन्त कहते हैं - यह स्वाभाविक है। अज्ञानता के कारण, प्रमाद के कारण, भ्रम के कारण अथवा अन्य किसी परिस्थिति के कारण व्यक्ति अपने धर्ममार्ग से कदाचित् स्खलित हो सकता है। उसमें कुछ दोष आ सकते हैं। लेकिन यदि कभी किसी के द्वारा कोई दोष हो जाये तो तुम उस दोष को ढाँक लो, उसको प्रचारित मत करो। उपगूहन का मतलब है धर्मात्मा लोगों के दोषों को देखकर भी अनदेखा कर दो। उसे ढाँक देना अथवा छिपा लेना। उसे प्रचारित नहीं करना। दूसरों के दोषों को ढाँकने का नाम उपगूहन है। सन्त कहते हैं कि दूसरों के दोषों को ढाँको और उनके गुणों को प्रचारित करो। अपने गुणों को ढाँको और दोषों को प्रचारित करो। हम लोग उल्टा करते हैं। किसी का थोड़ा-सा भी दोष दिख जाये तो उसे प्रचारित करने में हम सब माहिर हैं। किसी के बड़े से बड़े गुण भी हमें दिखाई नहीं पड़ते हैं और अपना छोटा-सा भी यदि गुण है तो उस गुण को फैलाने में हमें बहुत महारत हासिल है। हमें लगता है कि हमसे बड़ा गुणवान इस संसार में कोई दूसरा नहीं है। हमें अपने बड़े-बड़े दोष दिखाई नहीं पड़ते और दूसरों के बड़े-बड़े गुण नहीं दिखते हैं।