दिव्य विचार: मन में संदेह और शंका न रखें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: मन में संदेह और शंका न रखें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि धर्म आत्मा के आन्तरिक अनुशासन का नाम है। धर्म जहाँ हमारे जीवन को भीतर से संतुलित बनाता है वहीं हमारे व्यवहार को व्यवस्थित करने की भी प्रेरणा देता है। अन्दर में पवित्रता और बाहर में शालीनता धर्म का सही प्रतिफल है। भीतर और बाहर जब तक हम दोनों ओर व्यवस्थित नहीं होते हैं तब तक हम अपने समग्र जीवन का उद्धार नहीं कर सकते हैं। धर्म हमारे समग्र जीवन के रूपान्तरण का आधार है। वह जहाँ आन्तरिक शुचिता और पवित्रता की बात करता है, वहीं बाहर की विनम्रता, सौम्यता और शालीनता की ओर भी उतना ही ध्यान देता है। विगत दिनों से जिस सम्यग्दर्शन की हम चर्चा कर रहे हैं वह धर्म का प्रधान अंग है। उसके रहते ही हमारे भीतर धर्म पनप सकता है। अभी तक सम्यग्दर्शन के जिन अंगों की चर्चा की गई है, वह भीतर की ही थी। मन में संदेह और अश्रद्धा का अभाव होना, भय और शंका का निर्मूलन होना निःशंकित होना है। जब तक चित्त में संदेह का काँटा चुभा रहेगा, तब तक हम अपने जीवन को सुखी और शान्त नहीं बना सकते हैं। निःशंकित अंग ने हमारे अन्दर के संदेह को दूर कर निःशंक होने की प्रेरणा दी है। निःकांक्षित अंग ने सांसारिक अपेक्षा और विषयों की चाह को कम करके उनके प्रति उदासीनता रखते हुये निःकांक्षित बनने की प्रेरणा दी है। निर्विचिकित्सा अंग में हमने सीखा कि अब हमें अपने जीवन में घृणा और वैमनस्य को त्याग कर प्रेम, आत्मीयता और सौहार्द के बीज बोने हैं। आप अपने मन में कभी किसी के प्रति नफरत पैदा न होने दें। जहाँ तक बन सके अपने रिश्ते प्रेमपूर्ण बनाने की कोशिश करें। और इसके बाद अमूढ़ दृष्टित्व में हमने सीखा कि अपनी आस्था को अविचल बनाये रखें। चाहे कैसी भी स्थिति क्यों न आ जाये? चाहे जितना भय, प्रलोभन या कितना भी बड़ा दबाव क्यों न हो, अपनी दृष्टि को किसी से प्रभावित न होने दें। अपनी आध्यात्मिक और उपासनागत मूढ़ता को दूर कर सही आस्थावान बनें और अपने जीवन के पथ को प्रशस्त करने का प्रयत्न करें।