दिव्य विचार: प्रभु की सत्ता को पहचानने की दृष्टि विकसित करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि पुण्य-पाप दोनों नश्वर हैं। न पुण्य स्थायी है और न पाप स्थायी है। आप तो मुझे इतनी समता दो कि आने वाली विपत्ति को मैं सह सकूँ और अपनी आत्मा की निजी सम्पत्ति को प्राप्त कर सकूँ। जिसने अपनी सम्यक्त्व रूपी स्थायी सम्पत्ति को प्राप्त कर लिया है, उसे बाहर की यह सम्पत्ति और विपत्ति किंचित् भी विचलित नहीं कर पाती है। वह इसमें स्थिर बना रहता है। उसकी बुद्धि स्थायी बनी रहती है, उसकी चेतना निर्मल और विशुद्ध बनी रहती है। वह जीवन में बहुत कुछ उपलब्ध कर लेता है। वीतराग प्रभु की सत्ता को पहचानने की दृष्टि अपने अन्दर विकसित कीजिये। ऐसी कौन-सी ताकत है जो भगवान में न हो और उनमें हो ? संसार की ऐसी कौन सी चीज़ है जो वीतराग भगवान की पूजा से तुम्हें न मिले और उनकी पूजा-अर्चना से मिल जाये? संसार के जितने भी सरागी देवी-देवता हैं वे तुम्हारे अभिवादन के योग्य तो हो सकते हैं, पर अर्चना के योग्य नहीं। अर्चना और अभिवादन में बहुत अन्तर है। जैसे एक साधर्मी दूसरे साधर्मी को जय जिनेन्द्र करते हैं, वैसे ही उनसे भी कर लो। इससे बढ़कर नहीं। क्योंकि उससे ज़्यादा उनका स्थान नहीं है। एक बात और बता दूँ कि ये जितने भी देवी-देवता होते हैं, सब व्यन्तर होते हैं और ये बड़े खतरनाक होते हैं। उनसे दूर ही रहना श्रेयस्कर होता है। क्योंकि उनकी दोस्ती पुलिस की दोस्ती जैसी होती है। न पास रहना ठीक है, न दूर जाना। पल में प्रसन्न और पल में खिन्न हो जाते हैं इसलिये दूर रहोगे तो ज्यादा सुखी रहोगे। दोस्ती बढ़ाओगे तो ज़्यादा परेशान हो जाओगे। अगर अभी तक कहीं कोई करता भी रहा है तो उनसे क्षमा माँग लो। कहना - आज महाराजश्री के प्रवचन से हमने यह दृष्टि प्राप्त कर ली है कि आपके प्रति अनादर और अवज्ञा का मेरे मन में कोई भाव नहीं हैं। आप हमारे साधर्मी हैं, इसलिये अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखें। ताकि हमारी धर्माराधना ठीक ढंग से चलती रहे। हम अपने जीवन के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते रहें, जय जिनेन्द्र । इससे आगे नहीं ।






